Chnakya niti 2 : ऐसी कन्या से विवाह करना सदा ही दुखदायी होता है |

Chnakya niti 2: ऐसी कन्या से विवाह करना सदा ही दुखदायी होता है |

 वरयेत् कुलजां प्राज्ञो विरूपामपि कन्यकाम्।
रूपवतीं न नीचस्य विवाहः सदृशे कुले।।

बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न हुई कुरूप अर्थात् सौंदर्यहीन
कन्या से भी विवाह कर ले, परन्तु नीच कुल में उत्पन्न हुई सुंदर कन्या से विवाह न करे। वैसे
विवाह अपने समान कुल में ही करना चाहिए। 

आचार्य चाणक्य यह बहुत सुंदर बात कही है। शादी-विवाह के लिए सुंदर कन्या
देखी जाती है। सुंदरता के कारण लोग न कन्या के गुणों को देखते हैं, न उसके कुल को। ऐसी
कन्या से विवाह करना सदा ही दुखदायी होता है, क्योंकि नीच कुल की कन्या के संस्कार भी
नीच ही होंगे। उसके सोचने, बातचीत करने या उठने-बैठने का स्तर भी निम्न होगा, जबकि
उच्च और श्रेष्ठ कुल की कन्या का आचरण अपने कुल के अनुसार होगा, भले ही वह कन्या
कुरूप व सौंदर्यहीन हो। वह जो भी कार्य करेगी, उससे अपने कुल का मान ही बढ़ेगा और
नीच कुल की कन्या तो अपने व्यवहार से परिवार की प्रतिष्ठा ही बिगाड़ेगी। वैसे भी विवाह
सदा अपने समान कुल में ही करना उचित होता है, अपने से नीच कुल में नहीं। यहां 'कुल' से
तात्पर्य धन-संपदा से नहीं, परिवार के चरित्र से है।


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