Chanakya Niti : कामवासना के समान कोई रोग नहीं।
नाऽस्ति कामसमो व्याधिर्नाऽस्ति मोहसमो रिपुः।
नाऽस्ति कोपसमो
वह्निर्नाऽस्ति ज्ञानात् परं सुखम्।।
कामवासना के समान कोई रोग नहीं। मोह से बड़ा कोई शत्रु नहीं। क्रोध जैसी
कोई आग नहीं और ज्ञान से बढ़कर इस संसार में सुख देने वाली कोई वस्तु
नहीं।
अधिक कामवासना में लिप्त रहने वाला व्यक्ति शक्तिहीन होकर अनेक रोगों का शिकार हो जाता है। वह कामवासना की पूर्ति के लिए रोगी से संबंध बनाकर किसी रोग की गिरफ्त में भी आ सकता है। व्यक्ति का क्रोध उसके लिए आग का काम करता है। उसका अपना क्रोध उसे जला डालता है। ज्ञान से बढ़कर संसार में सुख देने वाली कोई भी वस्तु नहीं है, जो व्यक्ति बुद्धि और विवेक से कार्य करता है, वह सदा सुखी रहता है। मोह को सबसे बड़ा शत्रु बताया गया है। मोह का अर्थ है मूर्छा अर्थात् अविवेक। यह बुद्धि को नष्ट कर देता है।
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