Chanakya Niti : जीवात्मा स्वयं कार्य करता है और उसका फल भी स्वयं भोगता है।

Chanakya Niti : जीवात्मा स्वयं कार्य करता है और उसका फल भी स्वयं भोगता है । Chanakya about karma

स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते। 
स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद्विमुच्यते।।

chanakya about karma


जीवात्मा स्वयं कार्य करता है और उसका फल भी स्वयं भोगता है। वह स्वयं ही विभिन्न योनियों में जन्म लेकर संसार में भ्रमण करता है और स्वयं ही अपने पुरुषार्थ से संसार के बंधनों तथा आवागमन के चक्र से छूटकर मुक्ति को प्राप्त करता है। 

आचार्य के अनुसार, व्यक्ति जैसे कर्म करता है, उसके अनुसार ही उसे कर्मों का फल भोगना पड़ता है। कर्मों के फल के अनुरूप ही उसे दुख और सुख मिलता है। वह स्वयं ही अपने कर्मों के अनुसार संसार में विभिन्न योनियों में जन्म लेता है और जन्म-मरण के चक्र में पड़ा रहता है। उसे इस चक्र से मुक्ति भी स्वयं उसके श्रेष्ठ कार्यों से ही मिलती है। आचार्य का कथन है कि बंधन और मुक्ति दोनों तुम्हारे हाथों में हैं। 'स्वयं' शब्द पर जोर दिया है, जो उत्तरदायित्व की ओर संकेत करता है।


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