Chanakya Niti: दुष्ट मित्रों के बजाय मित्र न होना अच्छा है |
वरं न राज्यं न कुराजराज्यं वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्।
वरं न
शिष्यो न कुशिष्यशिष्यो वरं न दारा न कुदारदाराः।।
बुरे राज्य की अपेक्षा किसी प्रकार का राज्य न होना अच्छा है, दुष्ट मित्रों के बजाय मित्र न होना अच्छा है, दुष्ट शिष्यों की जगह शिष्य न होना अधिक अच्छा है और दुष्ट पत्नी का पति कहलाने से अच्छा है कि पत्नी न हो।
चाणक्य मानते हैं कि शासन-व्यवस्था से संपन्न राज्य में ही रहना चाहिए और मित्र भी सोच-विचारकर ही बनाने चाहिए। गुरु को भी चाहिए कि परखकर शिष्य बनाए तथा दुष्ट स्त्री को पत्नी बनाने की अपेक्षा अच्छा है कि विवाह ही न किया जाए।
कुराजराज्येन कुतः प्रजासुखं कुमित्रमित्रेण कुतोऽस्ति
निर्वृतिः।
कुदारदारैश्च कुतो गृहे रतिः कुशिष्यमध्यापयतः कुतो यशः।।
दुष्ट राजा के शासन में प्रजा को सुख नहीं मिल सकता, धोखेबाज मित्र से सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती, दुष्ट स्त्री को पत्नी बनाने से घर में सुख और शांति नहीं रह सकती, इसी प्रकार खोटे शिष्य को विद्या दान देने वाले गुरु को भी अपयश ही मिलता है।
सिंहादेकं बकादेकं शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात्।
वायसात्पञ्च
शिक्षेच्च षट्शुनस्त्रीणि गर्दभात्।।
व्यक्ति को शेर और बगुले से एक-एक, मुर्गे से चार, कौए से पांच, कुत्ते से छह और गधे से तीन गुण सीखने चाहिए।
इस संसार की प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक प्राणी हमें कोई न कोई उपदेश दे रहे हैं। इन गुणों को सीखकर जीवन में सफलता, उन्नति और विकास किया जा सकता है। आगामी चार श्लोकों में ऐसे ही कुछ गुणों का वर्णन किया गया है।
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